मध्यपूर्व तनाव से Crude Oil Prices में उछाल, भारत पर बढ़ सकता है आर्थिक दबाव

Middle East तनाव से Crude Oil Prices में उछाल, भारत पर बढ़ सकता है आर्थिक दबाव

मध्यपूर्व में बढ़ते geopolitical tension का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजारों में साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती टकराव की स्थिति ने global oil market में अनिश्चितता बढ़ा दी है।

28 फरवरी से शुरू हुए इस तनाव के बाद crude oil prices में तेज उछाल देखने को मिला है।

Brent Crude Oil की कीमत 27 फरवरी को लगभग 76 डॉलर प्रति बैरल थी, जो कुछ ही दिनों में बढ़कर 85 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई।

Middle East में जारी संघर्ष का सीधा असर crude oil और natural gas दोनों की कीमतों पर पड़ रहा है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए चिंता बढ़ गई है।


Crude Oil Price 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है

ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मध्यपूर्व में चल रहा तनाव जल्दी खत्म नहीं होता, तो तेल की कीमतों में और भी बड़ी तेजी आ सकती है।

Qatar ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर क्षेत्र में संघर्ष लंबा चलता है, तो crude oil की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है

यह स्थिति खासकर भारत जैसे देशों के लिए गंभीर हो सकती है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित तेल पर निर्भर करता है।

Crude Oil Prices

भारत के पास करीब 10 करोड़ Barrel Oil Stock

ऊर्जा एनालिटिक्स कंपनी Kpler के अनुसार भारत के पास फिलहाल लगभग 10 करोड़ बैरल commercial crude oil stock मौजूद है।

इस स्टॉक में शामिल हैं:

  • Storage tanks में रखा तेल
  • Underground Strategic Petroleum Reserve
  • वे oil tankers जो भारत की ओर आ रहे हैं

अगर महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग Strait of Hormuz के जरिए आने वाली सप्लाई पूरी तरह रुक जाती है, तो यह स्टॉक लगभग 40 से 45 दिनों तक देश की जरूरतों को पूरा कर सकता है

हालांकि मौजूदा स्थिति में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के संकेत अभी नजर नहीं आ रहे हैं।


भारत अपनी जरूरत का 88% Crude Oil Import करता है

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है।

देश अपनी कुल जरूरत का लगभग 88% crude oil import करता है। भारत में आने के बाद इस कच्चे तेल को refineries में प्रोसेस किया जाता है, जिससे पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन तैयार होते हैं।

भारत लगभग 50% crude oil मध्यपूर्व के देशों से खरीदता है, जो मुख्य रूप से Hormuz Strait के रास्ते भारत तक पहुंचता है।

मौजूदा geopolitical तनाव के कारण इस समुद्री मार्ग पर खतरा बढ़ गया है और सप्लाई बाधित होने की आशंका जताई जा रही है।


सप्लाई रुकने पर भारत को खरीदना पड़ सकता है महंगा Crude Oil

Kpler के एनालिस्ट Sumit Ritolia के अनुसार अगर कुछ समय के लिए मध्यपूर्व से crude oil supply बाधित हो जाती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक कीमतों पर पड़ेगा।

अगर Hormuz Strait लंबे समय तक बंद रहता है, तो global oil supply में बड़ा जोखिम पैदा हो सकता है।

हालांकि फिलहाल भारत की refining companies के पास कुछ commercial inventory मौजूद है और कई oil tankers भी रास्ते में हैं। इससे अल्पकालिक राहत मिल सकती है।

लेकिन अगर सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है, तो भारत को:

  • ज्यादा freight cost
  • महंगा crude oil
  • ऊंची import bill

जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।


FY25 में भारत ने Crude Oil Import पर खर्च किए 137 अरब डॉलर

भारत हर दिन लगभग 50 लाख बैरल crude oil import करता है। इसमें से करीब 25 लाख बैरल तेल Hormuz Route के जरिए आता है।

अगर इस मार्ग से सप्लाई प्रभावित होती है, तो भारत की import cost तेजी से बढ़ सकती है।

31 मार्च 2025 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में भारत ने crude oil import पर लगभग 137 अरब डॉलर खर्च किए थे।

वहीं चालू वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों में ही देश लगभग 100.4 अरब डॉलर का crude oil import कर चुका है। इस अवधि में भारत में करीब 20.6 करोड़ टन crude oil आया।


भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?

अगर crude oil prices तेजी से बढ़ते हैं, तो इसका असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

महंगे तेल का असर कई क्षेत्रों पर दिखाई देता है

  • पेट्रोल और डीजल की कीमतें
  • महंगाई दर
  • व्यापार घाटा
  • सरकारी सब्सिडी

ऊर्जा कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी से transportation और manufacturing लागत भी बढ़ जाती है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बन सकता है।


निष्कर्ष

मध्यपूर्व में बढ़ते तनाव ने global oil market में अनिश्चितता बढ़ा दी है। crude oil prices पहले ही तेजी से बढ़ चुके हैं और अगर संघर्ष लंबा चलता है तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।

भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति आर्थिक चुनौती बन सकती है। आने वाले समय में geopolitical घटनाक्रम और global oil supply की स्थिति पर बाजार और सरकार दोनों की नजर बनी रहेगी।

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