Sahara Group को SAT से बड़ा झटका
भारत के कॉरपोरेट और निवेशक सुरक्षा से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सामने आया है।
Securities Appellate Tribunal (SAT) ने Securities and Exchange Board of India (SEBI) के उस आदेश को बरकरार रखा है जिसमें Sahara India Commercial Corporation Limited (SICCL) और उसके निदेशकों को करीब ₹14,106 करोड़ निवेशकों को लौटाने का निर्देश दिया गया था।
यह राशि कंपनी ने Optionally Fully Convertible Debentures (OFCDs) के जरिए करीब 1.98 करोड़ निवेशकों से जुटाई थी।
SAT ने खारिज की Sahara की अपील
सोमवार को ट्रिब्यूनल ने SICCL, Sahara Group और कंपनी के कई निदेशकों की ओर से दायर अपीलों को खारिज कर दिया।
इन अपीलों में SEBI के 31 अक्टूबर 2018 के आदेश को चुनौती दी गई थी।
हालांकि SAT ने अपने फैसले में कहा कि कंपनी ने जुलाई 1998 से जून 2008 के बीच बड़ी संख्या में निवेशकों को OFCD जारी किए, जिससे स्पष्ट होता है कि यह फंड जुटाने की प्रक्रिया वास्तव में Public Issue की श्रेणी में आती है।

OFCD Issue को Public Issue माना गया
ट्रिब्यूनल के अनुसार कंपनी ने लगभग 1.98 करोड़ लोगों को डिबेंचर जारी किए, जिसे किसी भी परिस्थिति में Private Placement नहीं कहा जा सकता।
उस समय लागू Companies Act 1956 के अनुसार
- अगर किसी निवेश प्रस्ताव को 50 या उससे अधिक लोगों को दिया जाता है
- तो उसे Public Issue माना जाता है।
ऐसे मामलों में कंपनियों को:
- Stock Exchange से अनुमति लेना
- SEBI के नियमों का पालन करना
- आवश्यक Regulatory Disclosures देना
अनिवार्य होता है।
लेकिन SICCL ने न तो Listing Permission ली और न ही SEBI की मंजूरी हासिल की। इसी वजह से ट्रिब्यूनल ने माना कि SEBI को इस मामले में कार्रवाई करने का पूरा अधिकार था।
Delay का तर्क भी खारिज
सुनवाई के दौरान Sahara Group ने यह तर्क भी दिया कि SEBI ने कार्रवाई करने में काफी देरी की।
हालांकि SAT ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि SEBI ने सहारा समूह की अन्य कंपनियों से जुड़े मामलों की जांच और Ministry of Corporate Affairs की निरीक्षण रिपोर्ट मिलने के बाद जांच शुरू की थी।
इसके अलावा यह मामला करीब दो करोड़ निवेशकों से जुड़ा था और इसमें बड़ी मात्रा में दस्तावेज शामिल थे। इसलिए जांच में लगा समय असामान्य नहीं माना जा सकता।
Sahara की ओर से क्या दलील दी गई
सुनवाई के दौरान Sahara Group की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता JP Sen ने कई तर्क पेश किए।
कंपनी का कहना था कि
- अधिकांश निवेशकों को पहले ही पैसा वापस कर दिया गया है
- केवल लगभग ₹17 करोड़ के OFCD ही बकाया हैं
सहारा ने यह भी दावा किया कि करीब ₹4,400 करोड़ के OFCD को Equity Shares में बदल दिया गया था, जिसकी जानकारी Registrar of Companies (RoC) को दी गई थी।
निवेशकों को पैसा लौटाने का दावा
Sahara Group ने ट्रिब्यूनल के सामने यह भी दावा किया कि उसने बड़ी मात्रा में निवेशकों को रकम वापस कर दी है।
कंपनी के अनुसार:
- करीब ₹1,527.76 करोड़ चेक के माध्यम से लौटाए गए
- लगभग ₹8,157.80 करोड़ नकद में वापस किए गए
इन दावों के समर्थन में कंपनी ने Chartered Accountant Certificate और Branch Managers के Affidavits भी पेश किए।
Jurisdiction पर भी उठाए सवाल
Sahara Group ने यह तर्क भी दिया कि OFCD इश्यू की प्रक्रिया 1998 में शुरू हुई थी, जो Companies Act की धारा 67 में 2000 में हुए संशोधन से पहले की बात है।
इस आधार पर कंपनी ने कहा कि
- इस इश्यू को बाद के नियमों के आधार पर Public Issue नहीं माना जा सकता
- और यह पहले ही Registrar of Companies तथा Ministry of Corporate Affairs द्वारा Private Placement के रूप में स्वीकार किया जा चुका था।
साथ ही कंपनी ने यह भी कहा कि SEBI का अधिकार क्षेत्र मुख्य रूप से listed companies पर लागू होता है।
SEBI का आदेश बरकरार
इन सभी दलीलों के बावजूद SAT ने Sahara Group की अपीलों को खारिज कर दिया और SEBI के 31 अक्टूबर 2018 के आदेश को सही ठहराया।
इस फैसले के बाद:
निवेशकों को ₹14,106 करोड़ लौटाने का निर्देश बरकरार रहेगा।
