1991 से 86,000 तक Sensex की शानदार यात्रा और भारतीय शेयर बाजार की कहानी

1991 से 86,000 तक Sensex की शानदार यात्रा और भारतीय शेयर बाजार की कहानी

भारतीय शेयर बाजार की कहानी सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह आर्थिक सुधारों, बाजार में हुए बदलावों, तेज उतार-चढ़ाव और लंबे समय में बढ़ती निवेश संस्कृति की कहानी भी है। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय शेयर बाजार ने करीब साढ़े तीन दशकों में लंबी दूरी तय की है। सेंसेक्स के 1,909 के स्तर से बढ़कर 86,000 के पार पहुंचने तक का सफर इस बदलाव को साफ तौर पर दिखाता है।

1991 में कैसी थी भारतीय अर्थव्यवस्था?

1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। देश का विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम हो गया था और सरकार के सामने आयात तथा विदेशी भुगतान से जुड़ी बड़ी चुनौतियां थीं।

इसी दौर में जुलाई 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक बजट पेश किया। इस बजट में अर्थव्यवस्था को अधिक खुला बनाने, निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने और वैश्विक बाजार से भारत के जुड़ाव को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।

इन्हीं बदलावों को भारत में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG Reforms) की शुरुआत के तौर पर देखा जाता है।

आर्थिक सुधारों का शेयर बाजार पर असर

आर्थिक सुधारों का असर शेयर बाजार के प्रदर्शन में भी दिखाई दिया। 1991 के बजट के दिन सेंसेक्स में करीब 5% की तेजी आई। पूरे साल में इंडेक्स ने लगभग 82% का रिटर्न दिया और वर्ष के अंत में 1,909 के स्तर पर पहुंच गया।

इसके बाद बाजार में तेजी और बढ़ी। फरवरी 1992 में मनमोहन सिंह के दूसरे बजट से पहले के करीब सात महीनों में सेंसेक्स लगभग 94% चढ़ चुका था।

हालांकि, उस समय की तेजी के पीछे केवल आर्थिक सुधार ही जिम्मेदार नहीं थे। शेयर बाजार में बड़े पैमाने पर सट्टेबाजी भी हो रही थी।

हर्षद मेहता घोटाले ने बदली बाजार की तस्वीर

1991-92 की तेजी के बीच हर्षद मेहता से जुड़ा शेयर बाजार घोटाला सामने आया। मार्च 1992 में सेंसेक्स पहली बार 4,000 के पार पहुंचा था, लेकिन इसके कुछ ही समय बाद बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली।

28 अप्रैल 1992 को घोटाले से जुड़ी खबरों के बाद सेंसेक्स में करीब 13% की गिरावट आई। इस घटना ने निवेशकों को यह भी दिखाया कि शेयर बाजार में तेज रिटर्न के साथ बड़ा जोखिम भी मौजूद रहता है।

इसके बाद भारतीय पूंजी बाजार में समय-समय पर कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए, जिससे बाजार की निगरानी, पारदर्शिता और निवेश व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिली।

सेंसेक्स ने तीन दशकों में कितनी लंबी छलांग लगाई?

1991 के अंत में सेंसेक्स 1,909 के स्तर पर था। इसके बाद इंडेक्स ने कई आर्थिक संकटों, बाजार गिरावटों और वैश्विक घटनाओं के बावजूद लंबी अवधि में लगातार ऊंचे स्तर बनाए।

दिसंबर 2024 में सेंसेक्स पहली बार 86,000 के पार पहुंचा। यानी 1991 के 1,909 के स्तर से यह करीब 8,500% की वृद्धि थी। इस अवधि में सेंसेक्स का वार्षिक कंपाउंडेड रिटर्न (CAGR) लगभग 14% रहा।

यह आंकड़ा इस बात को समझने में मदद करता है कि लंबी अवधि में कंपाउंडिंग किस तरह निवेश के परिणामों को प्रभावित कर सकती है।

2014 से 2025 तक भी जारी रही तेजी

हाल के वर्षों में भी सेंसेक्स की वृद्धि उल्लेखनीय रही है। 2014 में इंडेक्स करीब 25,000 के आसपास था, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 86,000 के स्तर तक पहुंच गया।

2024 सेंसेक्स के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण वर्ष रहा। इस दौरान इंडेक्स ने पहली बार 75,000, फिर 80,000 और उसके बाद 85,000 के महत्वपूर्ण स्तरों को पार किया।

हालांकि, बाजार की यात्रा हमेशा एक जैसी नहीं रही। रिकॉर्ड ऊंचाई के बाद सेंसेक्स में गिरावट भी देखने को मिली। वैश्विक बाजारों में AI से जुड़ी चिंताएं, भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसे कारक निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं।

भारतीय शेयर बाजार की लंबी अवधि की कहानी

अल्पकाल में शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव सामान्य है, लेकिन लंबी अवधि की तस्वीर काफी अलग दिखाई देती है। बाजार विशेषज्ञ रामदेव अग्रवाल ने भारत की तेज आर्थिक और बाजार वृद्धि को रेखांकित करते हुए कंपाउंडिंग, बढ़ते वित्तीयकरण और अर्थव्यवस्था में हो रहे संरचनात्मक बदलावों को भारतीय बाजार की मजबूती के प्रमुख आधारों में गिना है।

उनके अनुसार, पिछले दो दशकों में भारत के बाजार पूंजीकरण में डॉलर के आधार पर करीब 14% की सालाना दर से वृद्धि हुई, जबकि अमेरिकी बाजार में यह दर लगभग 7% रही। इस तरह की वृद्धि बाजार के आकार को कुछ वर्षों में काफी तेजी से बढ़ा सकती है।

निवेशकों के लिए क्या सीख है?

सेंसेक्स की यात्रा से सबसे बड़ी सीख यह है कि शेयर बाजार में लंबी अवधि का नजरिया महत्वपूर्ण हो सकता है। बाजार में कई बार तेज तेजी आती है, तो कई बार बड़ी गिरावट भी देखने को मिलती है।

इसलिए केवल किसी रिकॉर्ड स्तर या हाल की गिरावट को देखकर बाजार की पूरी तस्वीर तय करना उचित नहीं है। निवेशकों को अपने निवेश से पहले कंपनी के fundamentals, valuation, risk और अपने financial goals को ध्यान में रखना चाहिए।

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