दिल्ली में Tata Group के शीर्ष अधिकारियों की अहम बैठक
Tata Group के शीर्ष अधिकारियों ने मंगलवार को दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात की।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बैठक में Tata Trusts के चेयरमैन Noel Tata और Tata Sons के चेयरमैन N Chandrasekaran मौजूद रहे।
हालांकि बैठक का एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब समूह के भीतर गवर्नेंस और ट्रांसपेरेंसी को लेकर विवाद सुर्खियों में है।
Tata Trusts में गवर्नेंस और पारदर्शिता पर बढ़ते मतभेद
हाल के हफ्तों में रिपोर्ट्स सामने आई हैं कि Tata Trusts के भीतर गवर्नेंस को लेकर असहमति बढ़ रही है।
कई ट्रस्टीज ने केंद्र सरकार से मध्यस्थता (intervention) की मांग की है ताकि संगठन के भीतर के मतभेद सुलझाए जा सकें।
इसके अलावा, Tata Sons की संभावित स्टॉक मार्केट लिस्टिंग (IPO) को लेकर भी बोर्ड में विभाजन बताया जा रहा है।
रतन टाटा की पुण्यतिथि से पहले मीटिंग का खास समय
यह बैठक ऐसे वक्त में हुई जब रतन टाटा की पहली पुण्यतिथि (9 अक्टूबर) से ठीक पहले 10 अक्टूबर को Tata Trusts Board Meeting निर्धारित है।
इस वजह से यह मुलाकात रणनीतिक और प्रतीकात्मक, दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

Tata Trusts Board में दो गुट बन गए
Tata Group का नियंत्रण Tata Trusts के पास है, जिसके पास Tata Sons में बहुमत की हिस्सेदारी है।
Tata Sons ही ग्रुप की Holding Company है, जो $180 बिलियन के साम्राज्य को नियंत्रित करती है —
जिसमें Tata Steel, Tata Motors, TCS, Tata Power जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अब Tata Trusts Board दो गुटों में विभाजित हो चुका है —
- पहला गुट: Noel Tata, Venu Srinivasan, Vijay Singh
- दूसरा गुट: Mehli Mistry, Darius Khambata, Jehangir Jehangir, Pramit Jhaveri
Mehli Mistry को रतन टाटा का करीबी और उनकी वसीयत (will) का executor माना जाता है।
Noel Tata के कार्यकाल में बदलता सत्ता संतुलन
रतन टाटा के समय में Tata Trusts में लगभग कोई विवाद नहीं था।
लेकिन Noel Tata के चेयरमैन बनने के बाद से decision-making में बदलाव और power balance को लेकर मतभेद बढ़े हैं।
कई ट्रस्टीज उनकी नेतृत्व शैली (leadership style) को लेकर असहज हैं और उनकी authority को चुनौती दे रहे हैं।
Tata Sons पर नियंत्रण — विवाद की जड़
Tata Group के आंतरिक नियमों के तहत, Tata Sons के किसी भी बड़े निर्णय —
जैसे ₹100 करोड़ से अधिक का निवेश या चेयरमैन की नियुक्ति/हटाने — के लिए Tata Trusts Trustees की मंजूरी जरूरी होती है।
सुप्रीम कोर्ट (2021) के फैसले Tata Sons vs Cyrus Investments में भी कहा गया था कि ये अधिकार “गवर्नेंस और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए संरक्षित अधिकार” हैं।
लेकिन अब कुछ ट्रस्टीज का आरोप है कि Trust-nominated Directors पर्याप्त जानकारी साझा नहीं कर रहे, जिससे निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
Tata Sons Listing पर बढ़ा विवाद
विवाद का बड़ा कारण Tata Sons की संभावित IPO लिस्टिंग है।
जबकि Pallonji Mistry family, जो minority shareholder है, चाहती है कि कंपनी publicly listed हो —
ताकि वे अपने कर्ज (debt) कम करने के लिए हिस्सेदारी बेच सकें।
Tata Trusts चाहता है कि कंपनी private बनी रहे ताकि ग्रुप पर नियंत्रण बरकरार रहे।
