भारत में चीनी निर्यात पर संकट के बादल, आने वाले वर्षों में Export लगभग बंद रहने की आशंका
दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों और उपभोक्ताओं में शामिल भारत आने वाले वर्षों में चीनी निर्यात (Sugar Export) से लगभग बाहर हो सकता है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर मानसून, एल नीनो के प्रभाव, घटते गन्ना उत्पादन और एथेनॉल की बढ़ती मांग के कारण देश में चीनी की उपलब्धता पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
इसी वजह से केंद्र सरकार घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए आने वाले कई सीजन तक चीनी निर्यात को सीमित या पूरी तरह रोकने की नीति जारी रख सकती है।
भारत की बदलती स्थिति दूसरे सबसे बड़े निर्यातक से संभावित आयातक तक
कुछ वर्षों पहले तक भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक था। लेकिन हालात तेजी से बदल रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि गन्ने का उत्पादन लगातार घटता रहा तो भविष्य में ऐसी स्थिति भी बन सकती है कि भारत को घरेलू मांग पूरी करने के लिए चीनी आयात (Sugar Import) का सहारा लेना पड़े।
यह बदलाव केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि वैश्विक चीनी बाजार के लिए भी बड़ा संकेत माना जा रहा है।
क्या है एल नीनो और इसका गन्ना उत्पादन पर क्या असर पड़ता है?
एल नीनो (El Niño) एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है।
इसका प्रभाव दुनिया भर के मौसम चक्र, वर्षा और तापमान पर पड़ता है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष एल नीनो के प्रभाव से भारत में मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। जून महीने में कई क्षेत्रों में औसत से कम बारिश दर्ज की गई है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।
किसान गन्ने की जगह दूसरी फसलों की ओर कर रहे रुख
कम बारिश और सिंचाई की बढ़ती लागत के कारण कई किसान गन्ने की खेती कम कर रहे हैं।
कई राज्यों में किसान अब गन्ने की जगह निम्न फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं:
- सोयाबीन
- अरहर (तूर)
- दालें
- अन्य कम पानी वाली फसलें
इस बदलाव का सीधा असर आने वाले वर्षों में गन्ने के कुल रकबे और उत्पादन पर पड़ सकता है।
चीनी उत्पादन और खपत के बीच बढ़ रहा अंतर
उद्योग के अनुमान के अनुसार मौजूदा सीजन में भारत का चीनी उत्पादन लगभग 2.79 करोड़ टन रह सकता है।
वहीं देश की वार्षिक चीनी खपत करीब 2.85 करोड़ टन आंकी जा रही है।
प्रमुख आंकड़े
- अनुमानित चीनी उत्पादन: 2.79 करोड़ टन
- वार्षिक खपत: 2.85 करोड़ टन
- मांग और उत्पादन के बीच अंतर: लगभग 6 लाख टन
उत्पादन और खपत के बीच बढ़ता यह अंतर चीनी मिलों के स्टॉक को भी प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी का अंतिम भंडार (Closing Stock) पिछले तीन दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच सकता है।
एथेनॉल की बढ़ती मांग भी बनी बड़ी चुनौती
भारत सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
सरकार की Ethanol Blending Programme के तहत गन्ने से बनने वाले एथेनॉल की मांग तेजी से बढ़ रही है।
उद्योग अनुमानों के अनुसार वर्ष 2039-40 तक देश में एथेनॉल की मांग मौजूदा स्तर की तुलना में दोगुने से भी अधिक हो सकती है।
इसका मतलब है कि गन्ने का एक बड़ा हिस्सा भविष्य में चीनी उत्पादन की बजाय एथेनॉल निर्माण में इस्तेमाल किया जाएगा।
वैश्विक चीनी बाजार पर क्या पड़ेगा असर?
भारत वैश्विक चीनी व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यदि भारत आने वाले कई वर्षों तक चीनी निर्यात नहीं करता है, तो:
- एशिया के आयातक देशों को नए सप्लायर तलाशने होंगे।
- अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों की लागत बढ़ सकती है।
- वैश्विक बाजार में चीनी की उपलब्धता कम हो सकती है।
- अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है।
ब्राजील और थाईलैंड भी चुनौतियों से जूझ रहे
भारत के अलावा दुनिया के प्रमुख चीनी निर्यातक देश ब्राजील और थाईलैंड भी मौसम संबंधी चुनौतियों और एथेनॉल की बढ़ती मांग का सामना कर रहे हैं।
यदि इन देशों में भी उत्पादन प्रभावित होता है, तो वैश्विक चीनी बाजार में आपूर्ति और अधिक घट सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
निष्कर्ष
भारत में कमजोर मानसून, एल नीनो का प्रभाव, घटता गन्ना उत्पादन और एथेनॉल की बढ़ती मांग चीनी उद्योग के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभर रहे हैं। घरेलू खपत को देखते हुए सरकार आने वाले वर्षों तक चीनी निर्यात को सीमित रख सकती है।
